उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिलने पर कांग्रेस के नेताओं का आपसी संघर्ष भी फिर से सतह पर
सत्ता का सेमीफाइनल माने जा रहे निकाय चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस के भीतर अब हार-जीत के आंकड़ों से ज्यादा चुनाव से पहले की रणनीति और बाद के सियासी मैनेजमेंट पर सवाल उठने लगे हैं. यही कारण है कि बिखरी बिखरी कांग्रेस और नेताओं की आपसी गुटबाजी निकाय चुनाव के परिणामों पर भारी साबित हुई है। चुनाव से पहले कांग्रेस अपने पक्ष में बेहतर माहौल का दावा करती रही लेकिन चुनाव में बड़े नेताओं की साझी रणनीति और सियासी मैनेजमेंट की कमी साफ नजर आई.
कांग्रेस के योद्धाओं ने चुनाव तो लड़ा लेकिन राजधानी से सियासी सेना लेकर एक साथ प्रदेश में निकलने की बजाय सभी नेता अपने-अपने किले बचाते हुए ही नजर आए. जबकि बीजेपी में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा खुद टिकट वितरण से लेकर बाग़ियों को मनाने और चुनाव प्रचार के लिए संभागों में रोड शो तक का मोर्चा संभालते दिखाई दिए.यही वजह है कि उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिलने पर कांग्रेस के नेताओं का आपसी संघर्ष भी फिर से सतह पर आ गया है. चुनाव बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीजेपी को घेरते-घेरते कांग्रेस की रणनीति पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं.दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मुख्यमंत्री और बीजेपी के बड़े नेताओं के आक्रामक प्रचार का कांग्रेस को भी जवाब देना चाहिए था. सभी बड़े नेता एक साथ निकलते. प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यक्रम बनाती. रोड शो और साझा अभियान होता. तो नतीजे बेहतर हो सकते थे. गहलोत ने कहा कि अगर सरकार के खिलाफ नाराजगी थी तो निर्दलीयों को कांग्रेस से ज्यादा वोट क्यों मिले?

