लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है. यह प्रत्येक नागरिक के मताधिकार का आधार है.

लखनऊ:आज लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में कांग्रेस नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता अभय दुबे ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया, आयोग के भीतर सामने आई असहमति तथा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर गंभीर सवाल उठाए.

आराधना मिश्रा ‘मोना’, नेता, कांग्रेस विधानमंडल दल एवं अभय दुबे, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की संयुक्त प्रेस वार्ता

1. सुप्रीम कोर्ट का फैसलाः 2 मार्च 2023
मामला: अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ. जस्टिस के.एम. जोसेफ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला दिया.
मुख्य चुनाव आयुक्त (सी.ई.सी.) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की सलाह पर करेंगे। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (सी.जे.आई.) होंगे.
यह व्यवस्था तब तक लागू रहनी थी, जब तक संसद इस पर कानून न बना दे.
2. सरकार का नया कानूनः दिसंबर 2023
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 लाया गया.
28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली.
इस कानून के तहत चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा गया. इस कानून के तहत पहली नियुक्तियां 14 मार्च 2024 को हुईं, जब ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू चुनाव आयुक्त बने.
3. ज्ञानेश कुमार की सी.ई.सी. नियुक्ति और राहुल गांधी का असहमति नोट फरवरी 2025
चयन समिति की बैठक 17 फरवरी 2025 को हुई और उसी रात ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति की अधिसूचना जारी हुई. उन्होंने 19 फरवरी 2025 को पदभार संभाला.
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने असहमति नोट दर्ज किया और 18 फरवरी 2025 को उसे सार्वजनिक किया.
उनकी मुख्य आपत्तियों में यह भी शामिल था कि सी.जे.आई. को चयन समिति से हटाना सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले की भावना के विपरीत है.
4. आयोग में निर्णयः सर्वसम्मति, वरना बहुमत - धारा 18(2), अधिनियम 2023
धारा 18(2) के अनुसार आयोग का सारा कामकाज, जहाँ तक संभव हो, सर्वसम्मति से होगा. राय अलग होने पर मामला बहुमत की राय से तय होगा.
अर्थात असहमति की स्थिति में तीन सदस्यीय आयोग में 2-1 का बहुमत मान्य होता है. सी.ई.सी. को केवल पद के आधार पर कोई अलग निर्णायक या सर्वोपरि मत देने का प्रावधान नहीं है.
5. आयोग के भीतर असहमति
पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज कीं। इनमें चार आपत्तियाँ एक ही दिन की थीं.
मई से अगस्त 2026 तक तीन सदस्यीय आयोग की कोई बैठक नहीं हुई.
दोनों आयुक्तों ने तत्कालीन कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग शिकायत पत्र लिखे। इसके बाद 9 सितंबर 2026 को चार महीने में पहली पूर्ण बैठक हुई.
दोनों आयुक्तों की शिकायत थी कि निर्णय उनकी जानकारी के बिना लिए जा रहे थे। संधू को नए आईटी  मॉड्यूल और पोर्टल की जानकारी तब मिली जब वे बन चुके थे.
दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता नाम हटाने और मतदाता डेटा तथा सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर भी आपत्तियाँ दर्ज कीं.
6. आयोग के भीतर असहमति का सवाल
यह सवाल गंभीर है कि यदि तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में दो चुनाव आयुक्त लगातार लिखित रूप से महत्वपूर्ण निर्णयों पर आपत्ति दर्ज कर रहे थे, तो उन आपत्तियों का निस्तारण किस प्रक्रिया के तहत किया गया.
दोनों आयुक्तों ने अपनी आपत्तियों में नए मतदाताओं से संबंधित प्रक्रियाओं, मतदाता सूची से नाम हटाने और आई0टी0 प्रणाली के संचालन पर सवाल उठाए.
7. अशोक लवासा का असहमति नोटः 2019 लोकसभा चुनाव
2019 में आयोग में सी.ई.सी. सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त अशोक लवासा तथा सुशील चंद्रा थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों से जुड़े आचार संहिता के मामलों में क्लीन चिट दिए जाने के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने असहमति दर्ज की थी.
30 अप्रैल 2019 को 1 अप्रैल के वर्धा भाषण से संबंधित मामला, 1 मई 2019 को 9 अप्रैल के लातूर भाषण से संबंधित मामला, जिसमें पहली बार के मतदाताओं से अपना वोट पुलवामा के शहीदों को समर्पित करने की अपील की गई थी, तथा 4 मई 2019 को 21 अप्रैल के पाटन भाषण से संबंधित मामला सामने आया.
लवासा ने सी.ई.सी. को 4, 10, 14 और 16 मई 2019 को पत्र लिखे. उन्होंने कहा कि जब तक अल्पमत की राय दर्ज नहीं होती, वे आचार संहिता से जुड़ी बैठकों से दूर रहेंगे. यह पत्र 18 मई 2019 को सार्वजनिक हुआ.
जून 2019 में आयोग ने आरटीआई के तहत असहमति नोट देने से इनकार कर दिया.
8. एसआईआर तीन चरण, राज्य और हटाए गए नाम
पहला चरण जून से सितंबर 2025 के बीच केवल बिहार में हुआ.
दूसरा चरण 4 नवंबर 2025 से शुरू हुआ. इसमें 9 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश शामिल थे.
तीसरा चरण 30 मई 2026 से जारी है. इसमें 16 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं.
कुल 26 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश तीनों चरणों में शामिल हैं।
तीनों चरणों में कुल 13.98 करोड़ नाम हटे हैं और 5.43 करोड़ मतदाताओं को अतिरिक्त दस्तावेजों के नोटिस दिए गए हैं।
9. फॉर्म 6 में बदलावः मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 का उल्लंघन
फॉर्म 6 नए मतदाता के पंजीकरण का वैधानिक फॉर्म है. यह मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13(1) और 26 के तहत तय है.
इसमें नया सवाल जोड़ा गया कि क्या आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछले एसआईआर की सूची में था. मई 2026 में विवेक जोशी ने लिखा कि 1960 के नियमों में संशोधन के बिना फॉर्म 6 में ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता संधू ने इसका समर्थन किया.जुलाई 2026 में इसके बावजूद बदलाव लागू कर दिया गया.
13 अगस्त 2026 को संधू ने इसे “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए तुरंत हटाने को कहा.
पूर्व सी.ई.सी. ओ.पी. रावत ने इस बदलाव को “पूरी तरह गलत और अवैध” बताया। एस.वाई. कुरैशी ने दोषपूर्ण सूची पर चुनाव कराने को लेकर सवाल उठाया.
10. एस.आई.आर. का कानूनी आधाररू जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3)
धारा 21 मतदाता सूची की तैयारी और पुनरीक्षण से जुड़ी है.
धारा 21(3) के अनुसार आयोग किसी भी समय, कारण दर्ज करते हुए, “किसी निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र के किसी भाग” की मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का निर्देश दे सकता है.
इसलिए एसआईआर के अधिकार और उसकी प्रक्रिया के बीच अंतर को समझना आवश्यक है. सवाल यह है कि आयोग को प्राप्त वैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए क्या नई प्रक्रियाएं और नई अनिवार्य शर्तें ऐसे तरीके से जोड़ी जा सकती हैं जो संसद द्वारा बनाए गए कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों में निर्धारित नहीं हैं.
11. अनुच्छेद 324 बनाम 327 एस.आई.आर. गणना फॉर्म की वैधता
1960 के नियमों में वैधानिक फॉर्म पहले से निर्धारित हैं। फॉर्म 6 नाम जोड़ने के लिए, फॉर्म 7 आपत्ति या नाम हटाने के लिए और फॉर्म 8 सुधार के लिए इस्तेमाल होता है. एसआई.आर. का गणना फॉर्म इन नियमों में निर्धारित वैधानिक फॉर्म से अलग प्रक्रिया का प्रश्न उठाता है.
अनुच्छेद 327 के तहत चुनाव और मतदाता सूची से संबंधित कानून बनाने का अधिकार संसद को है.
अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनावों के संचालन और उससे संबंधित संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या अनुच्छेद 324 के तहत आयोग ऐसे नए नियम या अनिवार्य शर्तें बना सकता है जो संसद द्वारा बनाए गए कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों में पहले से निर्धारित नहीं हैं.
मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 324 की शक्तियों की प्रकृति पर विचार किया और कहा कि जहाँ कानून मौन हो, वहाँ आयोग अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग कर सकता है.
ए.सी. जोस बनाम सिवन पिल्लै (1984) में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की शक्तियों की सीमा पर विचार करते हुए यह सिद्धांत स्पष्ट किया कि आयोग संसद द्वारा बनाए गए कानून और उसके अनुरूप बनाए गए नियमों के विपरीत आदेश जारी नहीं कर सकता.
कांग्रेस का मुख्य सवाल
आज का सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि चुनाव आयोग के पास एसआईआर कराने की शक्ति है या नहीं. सवाल यह है कि मतदाता सूची जैसे लोकतंत्र के मूल आधार से जुड़े निर्णय कितनी पारदर्शिता, वैधानिक प्रक्रिया और संस्थागत सहमति के साथ लिए जा रहे हैं.
जब स्वयं चुनाव आयोग के दो आयुक्त किसी प्रक्रिया पर बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज करते हैं, जब वे निर्णयों की जानकारी उन्हें न दिए जाने की शिकायत करते हैं और जब नए मतदाताओं के फॉर्म में किए गए बदलाव को लेकर “अनधिकृत और अवैध” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो इन सवालों का सार्वजनिक और स्पष्ट उत्तर दिया जाना आवश्यक है.
लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है. यह प्रत्येक नागरिक के मताधिकार का आधार है. इसलिए मतदाता सूची में किसी भी बदलाव की प्रक्रिया कानून, पारदर्शिता और उचित प्रक्रिया के अनुरूप होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है.