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पर्वतपुर रेगुलेटर का फाटक खुला रह गया दर्जनों गांवों में सैकड़ों एकड़ धान की फसल बर्बाद

सरयू नदी के उफान के बीच प्रशासनिक लापरवाही के कारण खुला रह गया फाटक बंद करने में चार दिन लग गए, जिससे बांसडीह तहसील के दर्जनों गांवों में सैकड़ों एकड़ धान की फसल डूब गई.

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 पर्वतपुर रेगुलेटर का फाटक खुला रह गया दर्जनों गांवों में सैकड़ों एकड़ धान की फसल बर्बाद

बलिया के पर्वतपुर में अंग्रेजों के जमाने का ऐतिहासिक रेगुलेटर पुल इस समय लाखों आबादी के लिए सुरक्षा कवच बना हुआ है. 

सरयू नदी के उफान के बीच प्रशासनिक लापरवाही के कारण खुला रह गया फाटक बंद करने में चार दिन लग गए, 

जिससे बांसडीह तहसील के दर्जनों गांवों में सैकड़ों एकड़ धान की फसल डूब गई.

ग्राउंड ज़ीरो से सामने आई वास्तविक स्थिति के अनुसार, पर्वतपुर रेगुलेटर का फाटक 1 अक्टूबर को खुला रह गया था. बढ़ते जलस्तर के बीच इस खुले फाटक को बंद करने में जिम्मेदार कर्मचारियों और अधिकारियों के पसीने छूट गए.

लगातार मशक्कत के बाद लगभग 4 अक्टूबर को जाकर इसे पूरी तरह बंद किया जा सका. 
तीन दिन से अधिक समय तक फाटक खुला रहने का नतीजा यह हुआ कि भेड़ी नाला और पकड़िया ताल से जुड़े निचले इलाकों में पानी तेजी से भर गया.

 इसका सीधा असर बांसडीह, अगउर, दराव, बकवा, राजा गांव, चानपुर, सहतवार, मैरिटार और कथौली तक देखा जा रहा है, जहां खेतों और बस्तियों के मुहाने तक पानी फैल चुका है.

 स्थानीय निवासी योगिंदर ने बताया कि खेतों में पानी भर जाने से किसानों की धान की फसल लगातार डूब रही है. 

क्षेत्र के 50 वर्षीय किसान रामाशीष ने साल 1998 की भीषण बाढ़ को याद करते हुए कहा, ‘उस समय सरयू नदी का रौद्र रूप दिखा था और पानी बंधे के ऊपर से बहने लगा था. 

यहां केवल गेहूं की खेती ही सुरक्षित हो पाती है, बाकी खरीफ की फसलें हमेशा भगवान भरोसे रहती हैं.’

 ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि जलस्तर में वृद्धि से पहले यदि प्रशासन ने नियमों के तहत गेट की जांच कर ली होती या समय रहते इसे बंद कर दिया जाता, तो आज सैकड़ों एकड़ में लहलहाती फसल बर्बाद होने से बच जाती.
गांव के पंकज मिश्रा के अनुसार, अत्यधिक प्रयासों और एहतियाती सुरक्षा उपायों के बाद अब जाकर हालात में थोड़ी स्थिरता आई है. 

स्थानीय स्तर पर यह पारंपरिक मान्यता भी है कि जितिया पर्व के बाद सरयू नदी का बढ़ा हुआ जलस्तर धीरे-धीरे कम होने लगता है. 

स्थानीय निवासी अनिल यादव ने औपनिवेशिक काल के इस मजबूत ढांचे की सराहना करते हुए आधुनिक निर्माण कार्यों की पोल खोली.

आज के दौर में गुणवत्ता विहीन निर्माण और भारी भ्रष्टाचार के कारण ही टिकुलिया और भोजपुरवा जैसे गांव कटान का शिकार होकर नदी में समा गए.

मौके पर मौजूद लोगों का स्पष्ट कहना है कि यदि पर्वतपुर के इस पुराने रेगुलेटर का फाटक पूरी तरह खुला रह जाता, तो लाखों की आबादी जलमग्न हो जाती और तबाही का दायरा अकल्पनीय होता.

ग्रामीणों ने मांग की है कि इस ऐतिहासिक पुल की नियमित तकनीकी जांच और पुख्ता रखरखाव सुनिश्चित किया जाए,

 ताकि भविष्य में किसानों और आम जनता को आपदा का सामना न करना पड़े.

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मौलिक रिपोर्ट · भारत · संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित

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