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श्रद्धांजलि :आ गये मेरी मौत का तमाशा देखने:नाना पाटेकर

नाना पाटेकर के जीवन में रंगमंच का भी बहुत बड़ा महत्व था। उस समय रंगमंच से न तो बड़ी कमाई होती थी और न ही वह आज की तरह लोकप्रियता देने वाला माध्यम था.

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 Nana Patekar

राजीव तिवारी बाबा

नाना पाटेकर : उस आवाज का खामोश हो जाना, जो सच बोलने की बेचैनी थी

नाना पाटेकर के जाने की खबर सिर्फ सिनेमा के एक अभिनेता के जाने की खबर नहीं है। 

यह उस आवाज के खामोश हो जाने की खबर है, जो पर्दे पर बोलती थी तो लगता था जैसे हमारे आसपास का कोई आदमी बोल रहा हो। उसमें बनावट नहीं थी, चमक-दमक नहीं थी। 

नाना पाटेकर में जिंदगी की खुरदुराहट थी, गुस्सा था, दर्द था और सच बोलने की बेचैनी थी। 

नाना उन कलाकारों में थे जिन्हें देखकर यह महसूस होता था कि अभिनय सीखा नहीं गया, बल्कि जिंदगी से निकाला गया है।
आज नाना पाटेकर की सफलता को देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगा सके कि यह सफर 35 रुपये महीने से शुरू हुआ था। किशोर उम्र में नाना स्कूल के बाद फिल्मी पोस्टरों में रंग भरने का काम करते थे। 

इसके लिए उन्हें महीने के करीब 35 रुपये और एक वक्त का खाना मिलता था। वह कई किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाते थे।यही वह दौर था जब उन्होंने गरीबी को बाहर से नहीं, भीतर से जाना। 

शायद इसीलिए बाद में जब उन्होंने गरीब, मजदूर, बेरोजगार या टूटे हुए आदमी का किरदार निभाया तो वह अभिनय कम और अनुभव ज्यादा लगता था।
Nanan

नाना के जीवन में रंगमंच का भी बहुत बड़ा महत्व था। उस समय रंगमंच से न तो बड़ी कमाई होती थी और न ही वह आज की तरह लोकप्रियता देने वाला माध्यम था। .

घर चलाने के लिए उनकी पत्नी नीलकांति नौकरी करती थीं और नाना थिएटर करते रहे। 

नाना ने सुरक्षित रास्ते के बजाय उस रास्ते को चुना जिसे वह अपना मानते थे। 

यही जिद आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। उन्होंने अभिनेता बनने की कोशिश नहीं की, उन्होंने अभिनेता की तरह जीना शुरू किया।

फिल्मों में उनका आना भी किसी चमकदार सपने की तरह नहीं हुआ। शुरुआत छोटी भूमिकाओं से हुई और लंबे समय तक उन्हें वह पहचान नहीं मिली जिसके वह हकदार थे।

 लेकिन नाना ने कभी अपने अभिनय को सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं माना। वह भूमिका चुनते थे, उसमें उतरते थे और उसे अपना बना लेते थे। परिंदा जैसी फिल्म ने उन्हें एक अलग पहचान दी और क्रांतिवीर ने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया।
क्रांतिवीर का उनका वह संवाद आज भी याद किया जाता है—“ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून, बता इसमें मुसलमान का खून कौन सा है और हिंदू का कौन सा?”

 यह संवाद इसलिए असरदार था क्योंकि नाना के चेहरे पर सिर्फ गुस्सा नहीं था, उसके पीछे एक बेचैन आदमी था जो समाज से सवाल कर रहा था।

 उनकी आवाज में जो आक्रोश सुनाई देता था, वह बनावटी नहीं लगता था। शायद इसलिए कि नाना खुद जिंदगी के अन्याय को बहुत करीब से देख चुके थे।

नाना को सिर्फ गुस्से का अभिनेता समझना उनके साथ अन्याय होगा। वही आदमी वेलकम में उदय शेट्टी बनकर लोगों को हंसा सकता था। “कंट्रोल, उदय, कंट्रोल” जैसे संवाद उनकी दूसरी छवि लेकर आए। इससे साबित हुआ कि जिस अभिनेता को लोग गंभीर और विद्रोही भूमिकाओं के लिए जानते हैं, उसके भीतर हास्य की भी उतनी ही गहरी समझ है। 

नाना की असली खूबी यही थी कि वह किसी एक खांचे में बंद नहीं हुए।

उनके जीवन का एक कम चर्चित पक्ष सैनिकों और सेना के प्रति उनका लगाव था। उन्होंने प्रादेशिक सेना का प्रशिक्षण लिया था और कारगिल युद्ध के समय सैनिकों के बीच जाने की इच्छा जताई थी। वह युद्ध क्षेत्र तक गया और सैनिकों के बीच समय बिताया।

 यह उस समय की बात है जब उनका फिल्मी कद काफी बड़ा हो चुका था। फिर भी उन्होंने देशभक्ति को केवल पर्दे पर संवाद बोलने तक सीमित नहीं रखा।

नाना के जीवन में निजी दुख भी कम नहीं थे। उनके बड़े बेटे दुर्वासा का जन्म शारीरिक विकलांगता के साथ हुआ और मात्र ढाई वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। यह ऐसी पीड़ा थी जिसे कोई पुरस्कार, कोई सफलता और कोई प्रसिद्धि कम नहीं कर सकते थी।

 वर्षों बाद जब नाना ने इस घटना के बारे में बात की तो उनके शब्दों में एक पिता का अपराधबोध और टूटन साफ दिखाई देती थी।

 शायद यही वजह थी कि उनके अभिनय में पिता का दर्द इतना वास्तविक लगता था।

उनकी जिंदगी का दूसरा बड़ा पक्ष किसानों और गांवों से जुड़ा था। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याओं और सूखे ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फाउंडेशन के जरिए किसानों और गांवों के लिए काम शुरू किया।

 पानी, खेती और गांवों की बुनियादी जरूरतों से जुड़े कामों में उन्होंने अपना समय और प्रभाव लगाया। 

यह काम किसी फिल्म के प्रचार का हिस्सा नहीं था। यह उस आदमी की बेचैनी थी जो पर्दे पर दूसरों का दुख दिखाने के बाद वास्तविक जीवन में भी उससे मुंह नहीं मोड़ना चाहता था।

नाना का व्यक्तित्व पूरी तरह निर्दोष या निर्विवाद भी नहीं था। उनका गुस्सा उनके जीवन का हिस्सा था और कई बार वही गुस्सा उनके लिए परेशानी का कारण बना।

 उनके व्यवहार और निजी जीवन को लेकर विवाद भी हुए। 2018 में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए, जिन्हें नाना ने खारिज किया। 

पुलिस ने बाद में पर्याप्त सबूत न मिलने का हवाला देते हुए मामला बंद करने की रिपोर्ट दाखिल की, हालांकि इस रिपोर्ट का विरोध भी हुआ।

 किसी भी बड़े सार्वजनिक व्यक्ति को याद करते समय उसके जीवन के ऐसे विवादित अध्यायों को छिपा देना उचित नहीं है।दरअसल, नाना पाटेकर की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह किसी आदर्श आदमी की कहानी नहीं है। 

यह एक ऐसे आदमी की कहानी है जिसमें अच्छाइयां भी थीं और कमियां भी। उसमें गुस्सा था तो करुणा भी थी। उसमें अहंकार के क्षण थे तो विनम्रता के भी। 

उसने गलतियाँ कीं और अपने जीवन के कुछ फैसलों पर पछतावा भी किया। लेकिन शायद महान कलाकार वही होता है जो अपनी कमजोरियों समेत दर्शकों के सामने खड़ा हो सके

PATEkar

नाना के अभिनय की सबसे बड़ी ताकत उनकी आवाज थी, लेकिन उनकी आवाज के पीछे उनकी जिंदगी थी। 

वह आवाज उस लड़के की थी जिसने गरीबी देखी थी। वह उस युवक की थी जिसने रंगमंच के लिए संघर्ष किया था। वह उस पिता की थी जिसने अपना बच्चा खोया था।

वह उस आदमी की थी जिसने किसानों की आत्महत्या देखी थी। और वह उस अभिनेता की थी जिसने अपने किरदारों को सिर्फ निभाया नहीं, उन्हें भीतर तक महसूस किया.
नाना पाटेकर को याद करने का सबसे सही तरीका शायद उनकी फिल्मों की सूची गिनाना नहीं है। 

उन्हें याद करने का सही तरीका उस संघर्ष को याद करना है जिसने उन्हें बनाया।

 35 रुपये से शुरू हुआ वह सफर करोड़ों लोगों के दिलों तक पहुंचा। 

दिलचस्प बात यह है कि सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी उनके भीतर का वह संघर्षरत आदमी पूरी तरह मरा नहीं। शायद वही आदमी उन्हें बाकी सितारों से अलग करता रहा।
नाना की जिंदगी हमें यह भी बताती है कि प्रसिद्धि आदमी को बड़ा नहीं बनाती। 

आदमी बड़ा तब होता है जब प्रसिद्धि मिलने के बाद भी उसे दूसरों का दर्द दिखाई देता रहे। 

नाना ने अपने तरीके से यह साबित करने की कोशिश की।

 कभी फिल्मों में, कभी रंगमंच पर, कभी सैनिकों के बीच और कभी किसानों के साथ खड़े होकर।

उनके जाने के बाद उनके संवाद जरूर याद किए जाएंगे। “कंट्रोल, उदय, कंट्रोल” पर लोग मुस्कुराएंगे। 

“ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून…” पर लोग ठहरकर सोचेंगे। लेकिन शायद आने वाले समय में उनके सबसे बड़े संवाद उनकी फिल्में नहीं, उनकी जिंदगी होगी।

एक ऐसा लड़का जिसने गरीबी से शुरुआत की। एक ऐसा अभिनेता जिसने रंगमंच को अपना घर बनाया।

  •  एक ऐसा कलाकार जिसने किरदारों में अपनी जिंदगी के अनुभव भर दिए. एक ऐसा पिता जिसने निजी त्रासदी को अपने भीतर ढोया. 

और एक ऐसा इंसान जिसने अपनी लोकप्रियता का कुछ हिस्सा उन लोगों के लिए लगाने की कोशिश की जिन्हें समाज अक्सर भूल जाता है।
नाना पाटेकर का जाना इसलिए एक अभिनेता का जाना नहीं है। यह उस दौर का अंत है जिसमें अभिनेता पर्दे पर सिर्फ चेहरा नहीं होता था, उसकी अपनी एक आवाज होती थी, अपना गुस्सा होता था और अपनी सामाजिक बेचैनी होती थी।

नाना पाटेकर को श्रद्धांजलि देते हुए शायद इतना ही कहा जा सकता है—उन्होंने जिंदगी को आसान नहीं पाया, 

लेकिन मुश्किल जिंदगी को अभिनय की ऐसी भाषा दी जिसे आने वाली पीढ़ियां लंबे समय तक समझती रहेंगी।

नाना अच्छे अभिनेता थे, इसलिए याद रहेंगे, लेकिन वह एक अच्छे इंसान थे, इसलिए भुलाए नहीं जाएंगे।

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मौलिक रिपोर्ट · भारत · संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित

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